Thursday, November 20, 2008

तीन रैन्डम यादें

पिछ्ले कुछ दिनों से हो रही उथल-पुथल समझने की कोशिश में बहुत दूर तक जाना पडा. ये नहीं कहता कि कुछ समझ पाया, लेकिन यादों से जुड के और कुछ नहीं तो एक perspective तो मिलता ही है. नाम काल्पनिक हैं, घटनाएँ करीब-करीब सच्ची हैं.


कमरे में एक अजीब सा excitement था. कम से कम हम बच्चों में तो था. ऐसा लग रहा था जैसे पहली बार हमें बडों की दुनिया का हिस्सा बनने दिया जा रहा है, हमें दुनिया के वो राज़ बताए जा रहे हैं जो बहुत ज़रूरी हैं और हम उन्हें समझने लायक हो गए हैं. (मैं तब साल का था, सन् १९८९ में.) हमारी मकान माल्किन के छोटे बेटे 'अतुल भैय्या', जो हमें रात को बिजली चली जाने के बाद भूत की कहानियाँ सुनाया करते थे, ने सब के अंदर जाने के बाद दरवाज़ा ठीक से बंद कर लिया और अतुल भैय्या के बडे भैय्या यानि कि 'आलोक भैय्या' ने कैसेट को टेप रिकार्डर की लपलपाती जीभ में डाला. कैसेट खुद--खुद अंदर चला गया और 'सट्ट' कर के किसी खाँचे में बैठ भी गया. नाना जी (मकान माल्किन के पिता) ने आखिरी बार परदे से झाँक कर बाहर चेक किया और आलोक भैय्या को टेप चलाने का इशारा किया. हम बच्चे लोग अपनी साँसें रोके इंतज़ार कर रहे थे. टेप घूमना शुरु हो गया था.

सबसे पहले हमने साध्वी ऋतम्भरा को सुना. उतनी जोश भरी आवाज़ हमने तब तक किसी की नहीं सुनी थी इसलिए हमें बडा मज़ा आया. साथ ही इस बात का डर कि कोई ना जाए, पर्दों से ज़मीन पर गिरती कटी-फटी धूप, मकान माल्किन आँटी के उस बडे वाले कमरे की अजीब सी खुश्बू, और टेप को जुट कर सुनते दो घरों के बडे - ये सब अपनी अपनी तरह से असर कर रहा था. बडे लोग साध्वी की हर बात पे सिर हिलाते, एक दूसरे को देखते और नाना जी तो कभी-कभी हुँकार भर के मन ही मन कोई गाली देते (और कभी-कभी भगवान का नाम लेते). कैसेट का एक साइड खतम हुआ तो मम्मी ने बताया कि साध्वी रितम्भरा "हमारे यमुनानगर" की ही हैं. वो जब से साल की थीं, तब से प्रवचन कर रही हैं और आज पूरे देश में लोग उनकी बातें सुनने के लिए पागल हैं. अब याद नहीं कि तब ये सुन के मैं मन-ही-मन बाकी बच्चों से ऊँचा हो गया था या नहीं लेकिन लगता है कि होना तो चाहिए था.

कैसेट का 'बी-साइड' और मसालेदार होने वाला था, ऐसी हवा थी. 'बी-साइड' में सबसे पहले बात शुरु की अशोक सिंघल जी ने और मुख्यमंत्री मुलायम सिंह को मुल्ला-आयम सिंह बोल के तुरंत ही हम बच्चों को खुश कर दिया. आलोक भैय्या को भी वो वाली बात बहुत पसंद आयी और कैसेट rewind कर के फिर चलाया गया. इस बार हमें याद था कि सिंघल जी कहाँ वो वाली बात बोलेंगे इसलिए हम लोग पहले से ही तैय्यार थे साथ में उन्हीं की तरह झटका मार कर बोलने के लिए. सिंघल जी के भाषण के बाद अब मुझे भी बातें थोडी थोडी समझ में आने लगी थीं. अयोध्या में एक मंदिर था, जहाँ भगवान राम का जन्म हुआ था. उस मंदिर पे मुसलमानों ने कब्ज़ा कर लिया था और अब मुलायम सिंह 'यादव' ('यादव' को लेकर भी कोई ताली-मार लाइन थी, लेकिन अब याद नहीं) हम हिंदुओं को उस मंदिर में नहीं जाने दे रहे थे. शायद एक हफ्ता पहले ही किराए का वी.सी.आर. मँगा के हम लोगों ने Newstrack नाम का वीडियो बुलेटिन भी देखा था जिसमें मुलायम सिंह की पुलिस को देश भर से अयोध्या पहुँचे राम सेवकों पे गोली चलाते हुए दिखाया गया था. हाथों में झंडे लिए और माथे पे टेनिस खिलाडियों जैसा कपडा बाँधे राम सेवक अयोध्या के एक पुल पे थे जब पुलिस पार्टी सामने से गई और लाठीचार्ज के साथ हवाई फायर किया. आधा दर्ज़न राम-सेवकों को पुल से नीचे बहती सरयू नदी में कूदना पडा था. (अयोध्या में सरयू बहती है, ये हमें टीवी पे रामायण देख के ही पता चला था.) Newstrack भी हम लोगों ने चोरी-छुपे, पर्दे लगाकर देखा था और उसके बाद फिल्म पत्रिका 'लहरें' भी देखी थी. अशोक सिंघल जी ने भी Newstrack वाली घटना के बारे में बोला और मकान माल्किन आँटी सुनते सुनते रोने लगीं. भाषण खतम करने से पहले उन्होंने ज़ोर से 'जय श्री...' बोला और हम लोगों ने उतने ही जोश से 'राम'.




अर्शद बहुत तेज़ बाँलिंग करता था. और उसका रन-अप भी बहुत लंबा नहीं था. वसीम (अकरम) की तरह वो भी अपनी बाज़ू के तेज़ घुमाव और कलाई के तेज़ झटके के दम पे इतनी स्पीड जनरेट करता कि विकेट के पंद्रह फुट पीछे खडे होने पर भी और हाथ में मोटे डबल-लेयर दस्ताने पहनने के बाद भी बॉल हाथ में चिपकती. अर्शद का छोटा भाई अदनान, जो उससे सिर्फ - मिनट ही छोटा था, स्पिन करता था और बॉल को ऐसे नचाता था कि कई बार टिप्पा पडने के बाद बॉल वापस उसकी तरफ ही चली जाती थी.

हम सबकी फील्डिंग पोज़िशन्स अक्सर इंटरवल से पहले ही तय हो जातीं थीं. अर्शद दूसरे या तीसरे पीरियड में ही अपनी कॉपी के पिछले पन्ने पर मैदान का नक्शा बना के उसमें ग्यारह खिलाडी सैट कर देता. उसके बाद वो कॉपी क्लास भर घूमती और हम लोग उस नक्शे को बडी संजीदगी से स्टडी करते. मैं काफी मोटा था इसलिए मुझे अंपायर या विकेट कीपर ही बनाया जाता, और क्यूँकि मैं मोटा था, मैं दोनों हाल में खुश ही रहता. अंपायर होने का एक और बडा फायदा ये था कि मेरी दोनों टीमों से दोस्ती बनी रहती थी, और पता नहीं क्यूं, उस उम्र में ये मेरे लिए बहुत ज़रूरी था. मैं तह--दिल से मानता था कि मुझे बार बार अंपायर बनाने के पीछे बडा कारण यही है कि सब मेरे दोस्त हैं, मुझ पे भरोसा करते हैं. (और हाँ, हर ओवर के बाद बॉल एक बार अंपायर के हाथ में देने का रिवाज़ मुझे बहुत पसंद था.)

खैर, उस दिन भी मैं ही अंपायर था. और उस दिन मुझे ज़्यादा अलर्ट रहना था क्यूँकि खेल में LBW का रूल भी जोड लिया गया था और बहुत सारी फालतू अपीलें होने वाली थीं. सामने क्रीज़ पे अभिनव था - हिंदी वाले शर्मा सर का बेटा. सर का बेटा था इसलिए स्पोर्ट्स रूम से स्टम्पस और ग्लवज़ भी वही दिलाता था, और इसलिए पहले बैटिग भी वही करता था. इधर से, हमेशा की तरह अर्शद रहा था. अर्शद अक्सर पहली बॉल वाइड फेंकता था लेकिन उस दिन उसकी पहली बॉल ही सीधी अभिनव के पेट में जा घुसी. अभिनव के हाथ से बैट छूट गया और वो एक-दो मिनट के लिए घुटनों के बल बैठ गया. सब जानते थे अभिनव की नौटंकी इसलिए कोई उसको सिम्पैथी देने आगे नहीं गया. बल्कि 'वन डाउन' आने वाले संदीप ने दूर से यही पूछा कि अगर उसे आराम करना है तो रिटायर हो जाए. नॉन स्ट्राईकर पे खडे मन्नू (असली नाम मनु था) ने मेरी ओर देख कर दाँत निपोरे और बोला - अब खडा हो जाएगा साला.

वही हुआ भी. अर्शद वापस अपने रन-अप पे गया और अभिनव क्रीज़ से एक फीट आगे के खडा हो गया, थोडे से अटैकिंग मूड में. मैंने पूरे स्टाइल से अपने हाथ का सिग्नल डाउन किया और अर्शद दौडता हुआ, धूल उडाता हुआ आया. इस बार बॉल शॉर्ट-पिच थी और बहुत तेज़ भी. अभिनव कुछ समझ पाता इससे पहले ही उसकी नाक के अंदर जो आवाज़ उठी थी वो उसके दिमाग तक पहुँची और खून की दो बूँदें, हिटलर की मूँछों की तरह, उसकी नाक के नीचे के बैठ गयीं. बल्ला फिर हाथ से छूटा, घुटने फिर टिके, लेकिन इस बार अर्शद बहुत तेज़ी से उसकी तरफ भागा और जल्दी से उसको पकडने की कोशिश की. "रुमाल भिगा के लाओ कोई...जल्दी", अर्शद चिल्लाया और क्यूँकि मैं ही अंपायर था, तो ये काम मेरा ही बनता था. गेट के पास लगे हैन्ड-पम्प से जल्दी से मैंने अपना रुमाल गीला किया और वापस दौडा. तब तक वहाँ सब जमा हो गए थे और अर्शद ने अपने रुमाल से खून को रोका हुआ था. अभिनव काफी हैरान सा दिख रहा था पर शांत ही था. अर्शद ने पानी वाले रुमाल से थोडा पानी उसके सिर पे निचोडा और बाकी से उसकी नाक पोंछने लगा. और तभी पता नहीं अभिनव को क्या हो गया.

हम सब ने अभिनव को कभी वैसे नहीं देखा था. उसकी नाक पे पानी पडते ही शायद दर्द हुआ होगा और इसलिए उसने अर्शद को ज़ोर से धक्का दिया और चिल्लाया - 'साले कटुए!' मैंने ये शब्द पहले हवा-हवा में ही कहीं सुना था...और इस्तेमाल में तो कभी नहीं. अर्शद उसके धक्के से पीछे गिर गया और अभिनव तेज़ी से उठ के खडा हो गया. सब लोग अभी शब्दों और माहौल का अर्थ निकालने में ही लगे थे कि अभिनव ने बल्ला उठा के अर्शद के कंधे पे बजा दिया और बौरा गया - 'कटुए हरामी! सालों पाकिस्तान के कुत्तों...नाक फोड दी मेरी....तुझे तो मैं....' मैं बहुत डर गया, और ज़्यादातर बच्चे मेरी ही तरह चुपचाप खडे रहे. अदनान, अर्शद का भाई, कभी अभिनव को तो कभी अर्शद को 'भाई....भाई...' बुलाता रहा, और अभिनव के कुछ दोस्त उसको रोकने की 'नौटंकी' करते रहे (या हो सकता है कि वो इतने गुस्से में था कि वो बार बार छूट जाता था.)

थोडी देर अर्शद पिटता रहा, अदनान रोने को गया, और हम लोग वोयरिस्टिक प्लैज़र के लिए देखते रहे. लेकिन एक बात जो मैंने तब नहीं सोची, वो अब अजीब सी लगती है. डील-डौल में अर्शद अभिनव से कम नहीं था, और अभिनव ऐसा कोई 'फेवरिट' भी नहीं था क्लास का, लेकिन फिर भी उस दिन अर्शद ने एक बार भी रेज़िस्ट नहीं किया. बल्कि मुझे तो उसकी चुप्पी के सिवा कुछ याद नहीं.




बस चल पडी थी. मैं खिडकी से आधा अंदर और आधा बाहर लटका हुआ था, और बस चल पडी थी. मम्मी पापा इस बस में चढे थे या नहीं ये मुझे नहीं पता था. पर भीड इतनी थी कि मुझे लगा नहीं चढे होंगे. और इतना काफी था रोना शुरु करने के लिए. किसी ने मुझे अंदर खीँचा और आरती की थाली की तरह मुझे बस में घुमा दिया गया. रोते हुए मुटल्ले बच्चे को कोई वैसे भी ज़्यादा देर क्यूँ पकडता, वो भी जब उसके माँ-बाप ने उसे खिडकी से अंदर डाल दिया हो और खुद बस-स्टैंड पे ही रह गए हों.

हम लोग मसूरी जा रहे थे, मैंने नया स्वैटर पहना था, और सर पे गावस्कर के पहले हैल्मेट जैसी टोपी भी थी. लेकिन रोना नहीं रुकता था और भीड इतनी थी कि कुछ समझ भी नहीं रहा था. और तरुण्, मेरा छोटा भाई, वो कहाँ था? कहीं उसे भी बस में तो नहीं चढाया था खिडकी से? ये सोच के मैं और ज़ोर से रोने लगा. (अब मुझे लगता है बच्चों को रो के हौसला मिलता है.) फिर पता चला, कुछ लोगों ने बस घुमाने को कह दिया था. एक अंकल ने मुझे चुप कराते हुए कहा कि हम लोग वापस जा रहे हैं - बस स्टैंड. किसी ने चुप कराने के लिए शायद संतरे वाली गोली भी दी थी.

बस वापस उसी बस अड्डे पर गई जहाँ थोडी देर पहले, भीड की धक्का-मुक्की और बसों की कमी की वजह से मैं अकेला चला गया था. मुझे उतार कर बस वापस चली गई और पापा उन लोगों का धन्यवाद भी नहीं कर पाए जिन्होंने बस वापस घुमाई थी. पापा ने मुझसे पूछा कि कौन अंकल थे तुम्हें पता है क्या? और मैंने बस वो संतरे वाली गोली दिखा दी - यही वाले थे शायद.


10 comments:

Anonymous said...

Maxxx kahani hai. Aaaj tak ki aapki sabhi kahaniyon main sey issi ney sabsey jyaada prabhavit kiya hai mujhey. Aur yeh pichli kahaniyon ko bhool jaaney key karan nahi likh raha!
aapney bhaav bahut unchey level par pakdey hain, pata nahi kaisey kahoon jo main kehna chahta hoon, magar yeh bilkul high-pedigree key lekhak ki kahaniyaan lag rahi hai.

Sabsey amazing teesri story hai aur santrey waaley uncle key peechey chhupi hui shayad dono kahaniyaan ka saar.. !1

Abhi itna hi vishek milney par :) apni samajh ka jyaada majaak blog par udaana uchit nahi

Likhtey rahiye, prerna milti hai!

-Sushant

Vaibhav said...

Doosri kahaani bahut badhiya lagi...mujhe thodi phodu ending aur badi badi ghatnayen achchhi lagtai hai...aam taur par...

Sabse achchhi lagi kahani ki detailing...magic days ke likhe gaye episode thoda phir se likhunga...detailing lagta hai zaroori hai...bachpan mein pata nahi hota kaun si ghatnayen badi hain aur kaun si chhoti...to binaa detail mein jaaye upar se ek badi kahaani sunaane se sahi nahi rahega...

achchaa hai...ye series banaa daaliye bhaiya aur personally mail kar dijiye...:)

Abhijeet singh parmar said...

आपकी बस्ती मेरी बस्ती जैसी क्यूँ लगती है,
आपका दोस्ताना मेरे आईने से निकला लगता है,('अतुल भैय्या', जो हमें रात को बिजली चली जाने के बाद भूत की कहानियाँ सुनाया करते थे),
आपके खिलोने, आपके खेल, आपकी कहानियाँ, मेरी अपनी हैं,
वोही लहजा गाली का, वोह किस्सा गल्ली डंडे का, (नॉन स्ट्राईकर पे खडे मन्नू (असली नाम मनु था) ने मेरी ओर देख कर दाँत निपोरे और बोला - अब खडा हो जाएगा साला.)
वही वज़न (मुटल्ले बच्चे को कोई वैसे भी ज़्यादा देर क्यूँ पकडता), वही लालच (और मैंने बस वो संतरे वाली गोली दिखा दी - यही वाले थे शायद.)
लोग कहते हैं के कुछ दूरी पे हैं दोनों, पर हमें तोह
आपका लखनऊ हमारे jabalpur जैसा ही लगता है,

Varun said...

@ Abhijeet

दो बातें हैं. एक तो ये कि हमारे सारे शहर (छोटे शहर) एक जैसे ही हैं (और अगर मैं इनमें 80's के बंबई के कांदिवली और दिल्ली के बाहरी इलाके, जैसे कि पीतमपुरा भी जोड दूँ तो गलत नहीं होगा) - सबमें एक ही तरह का आलस, अपनापन, छिछोरपन, प्यार और डर हैं. अब जा के शहर बिखरने और बँटने शुरु हुए हैं...वरना पहले सबमें एक ही तरह का 'India' रहता था. और शायद इसीलिए उस ज़माने में 'महाभारत' और DDLJ सब जगह बराबर चले. आज ना कोई कोशिश करता है और शायद ना ही possible है सबको एक ही बक्से में डाल देना. थोडा डर के और थोडा उदास हो के ये भी कह सकता हूँ कि अब शायद लखनऊ भी जबलपुर जैसा ना रहा हो.

दूसरी बात ये कि पहली और तीसरी कहानियाँ देहरादून की हैं और बीच वाली लख्ननऊ की. तो फिर वही बात आती है कि ये दोनों शहर भी बहुत दूर दूर हैं...लेकिन उतने दूर भी नहीं.

Abhijeet singh parmar said...

सही बात है, अब तोह अपने ही शहर के महौल्लों में भी फर्क दिखाई पड़ता है,
एक बात और है
स्कूटर पे पापा के पीछे बैठ के सब्जी मण्डी जाता था, एक five star के लालच में,
अब वहां reliance fresh है,
और Five star से भी मन सा उठ गया है
थोड़ा शहर बदला है, थोड़ा हम भी बदले हैं
इसलिए जिस डर की आप बात कर रहे हैं(थोडा डर के और थोडा उदास हो के ये भी कह सकता हूँ कि अब शायद लखनऊ भी जबलपुर जैसा ना रहा हो) ,
वोह दोनों के बदलने से है

Akshat said...

kyonki doosri kahani ke ek adna kirdaar hum bhi the(shayad), magar ho na ho ye ghatna mujhe bhi yaad hai.ek mazedaar bat ye ki arshad aur uske bhai ke to apne credentials bhi the criket ke liye atleast par fir bhi aisa hua..mujhe afsos is baat ka hai ki arshad ki chuppi ke saath mujhe apni chuppi bhi hubahu yaad hai .haalanki wo chuppi keval baahari hi thi..Varun bhai- kahani mein maza aa gyaa aur layout itna zordaar aapne taiyaar kiya...teesri kahan ne bhi dil chua.sahi kahan tumne ki ab chote shaharon mein bhi itna bikhraav sa hai ki yakeen nahin hota...aaj jab mai kabhi lucknow jaata hoon aur muskuraaiye ki aap lucknow mein hain ka board dekhta hoon to ek tees si hi hoti hai bas..

Anonymous said...

enko kahani kahna sahi me galat hoga...enka vistar bahut bada hai... ya shayad mere riste ki wajah se mai aisa kah rahi hun.pata nahi...etni nispaksh nahi ho pa rahi..
कहाँ की यादें
कितनी यादें
कैसी यादे
कहाँ पे बिखरी
कहाँ पे छूटी
कहाँ की तितली
कहाँ से निकली
और खिले कभी
मुरझाए से हम

etna hi kah paungi...

Rakhi

annu said...

Guru jee iss baar phir chaap diye hai...pehli kahani men हाथों में झंडे लिए और माथे पे टेनिस खिलाडियों जैसा कपडा बाँधे राम सेवक
doosri mein ...मुझे बार बार अंपायर बनाने के पीछे बडा कारण यही है कि सब मेरे दोस्त हैं, मुझ पे भरोसा करते हैं. (और हाँ, हर ओवर के बाद बॉल एक बार अंपायर के हाथ में देने का रिवाज़ मुझे बहुत पसंद था.)...waakai mein bachpan mein kho gaye honge aap jab likh rahe honge..
Aage jaroor likhiyegaa...intezaar rahega..!!

-Anurag

Sumit kr. soni said...

Teeno kahaniya 'ek se badh ke ek' lagi, par doosri kahani jaise dil ko chu si gayi ho. Padh ke bachpan ke vo din yaaad kiye bina na raha gaya jab har weekend par or kabhi kabhi week days me bhi shaam ko ( spcly jab india ka one day match hoota tha, or by chance india last wicket pe srinath ke sixer se jeeeth jaati thi ), teen patthar gali ke beecho beech rakh ke, kapde dhone walla balla aisa ghumate the jaise ki mano muhalle ka sachin maidaaan me utar aaaya hoo, phir chahe saamne wale uncle ki khidki ka kaanch toote ya aaankh.

Bekhoob likha he bhai, maan gaye ustaaaj.. waah taj..

Anonymous said...

Advani's much criticised Rath yatra and subsequent demolition of that wretched masjid were the most important events which shaped the history of this region for the years to come.

Picture this, after ruling India for centuries muslims were for the first time stripped of their domination over Indian cultural-socio-political scene in 1947 when they got a seperate country of their own
that too after so much bloodshed. This obviously didn't went down too well with muslims but they kept quite for some time as the wounds of partition were still fresh in Hindu minds.

Then came the 70s/80s and the Iranian 'cultural revolution' established the rule of shariat, mujahids were upbeat with the defeat they handed out to Russian forces in afganistan and Indian muslims
encouraged by all this once again started to assert their fundamentalism. AS a big morale booster they won two big battles, Shah Bano case and banning of Satanic Verses the stage was all set for
another wave of Islamic frezny to grip Indian subcontinent and the beginning was made in Kashmir.

The one man who rose against this and mobilised the entire nation to fight for its life liberty and faith was Advani. The nation had not witnessed an uprising of such magnitude since Independence and the message reached muslims "We are not going to take it lying down, not anymore !!"

I'm hardly a religious person and even if a temple is built at ayodhya there's a little chance that i'd visit it but still it gives me immense pleasure to think that we did atleast ONE thing which still pisses these terrorists off.